सभी मनुष्य भगवान शनि देव अथवा शनि गृह को जानते और मानते भी हैं। जिन्हे ईश्वर पर विश्वास नहीं होता है वह भी शनिदेव के प्रभाव से डरते ज़रूर है। इस प्रकार भगवान शनि देव सब पर ही अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं। भगवान शनि देव की विशेषताएं कुछ इस प्रकार हैं।इन्हें कर्म फल दाता के नाम से भी संबोधित किया जाता है। शनि गृह ही हमारे जनम, मृत्यु एवं सम्पूर्ण जीवन को निर्धारित एवं प्रभावित करता है। शनि देव काले रंग के हैं और लोहे के स्वामी हैं। इस गृह का महत्व मनुष्य जीवन में बहुत अधिक माना जाता है। शनि हर राशि से 21/2 बार गुजरता है और कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। जब शनि जन्म स्थान से बारहवें (12) स्थान पर होता है तब उसे विरय स्थान कहा जाता है। इस दौरान अत्यधिक खरच एवं धन की हानि होती है। इसके बाद शनि जनम राशि मे आता है जिसके कारण स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। इसके बाद जब शनि दूसरे स्थान पर जाता है, उसे पाद शनि केहते हैं, जो मनुष्य को सब से कठिन समय दिखाता है।

शनि देव एक ऐसे गृह हैं, जो कभी किसी पर दया नहीं करते। क्यूंकि हर कर्म का एक निर्धारित फल है, जो शनि देव पूरी निष्पक्षता से हर किसी के साथ न्याय करते हैं। वह कहीं कोई समझौता नहीं करते। जब शनि आठवें (8) गृह me प्रवेश करता है तब जीवन में हर तरह के उतार चढ़ाव आते हैं। मौत जैसी समस्या भी आ सकती है, इंसान कंगाल भी हो सकता है, या इससे भी ज्यादा खराब परिस्थिति हो जाती है। पर यह सब पूर्व जन्मों में बोए गए बीजों का परिणाम होता है। पुराणों में भी शनि के प्रकोप का ज़िक्र है, जिससे स्वयं भगवान परस्मेश्वर भी नहीं बच सके। शनि की दृष्टि जब 3,7,10 स्थान पर पड़ती है, तब दशा 19 साल तक होती है। इस दौरान शनि इंसान को बहुत गरीब बना देता है या किसी बड़ी मुसीबत में डाल कर उसे सबक सिखाता है। बिना शनि की कृपा दृष्टि के कोई भी कार्य जीवन में नहीं हो सकता। यहां तक कि किसी भी प्रकार के कारखाने को चलाने के लिए शनि की कृपा होनी बहुत आवश्यक है। विकलांग, अनाथ और वृध्द लोगों का मस्तिष्क शनि ही है। तंत्रिका तंत्र का शासक भी शनि ही है और हमारे शरीर में पैरो मे इनका स्थान होता है। कर्मचारियों पे शनि का ही शासन होता है। अगर कोई शनि देव की पूजा या सेवा करके उन्हे ख़ुश रखता है तो उस पर हमेशा ही कृपा बनी रहती है।
सिर्फ दो ही ऐसे लोग हैं जो शनिदेव के न्याय से बचे हैं या उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उनमें से एक हैं भगवान श्री गणेश, जो स्वयं ज्ञान के देवता हैं और दूसरे भगवान हनुमान, जो अपने निष्ठावान एवं निष्कपट सेवा के लिए जगत प्रसिध्द हैं। इससे यह आभास होता है कि जो लोग निष्ठावान और निःस्वार्थ भाव से धर्म के अनुसार अपने कर्म करते हैं और हमेशा परमेश्वर के ध्यान मे रहते हैं उन्हे शनि देव कुछ नहीं करते। अर्थात एक सच्चे सन्यासी या ज्ञान योगी एवं एक कर्म योगी को शनि देव से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।.

कुंडली मे किस गृह पे शनि का प्रवेश होने पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका विवरण कुछ इस प्रकार है- पहला स्थान (1) यानी जन्म स्थान पर होने से इंसान बहुत स्वार्थी, आलसी और स्वास्थ संबंधी समस्याओं से जूझता रहता है। दूसरा स्थान (2) होने से धन लाभ नहीं होता, और ऐसे मनुष्य परिवार के लिए स्वयं को ही त्याग देते हैं। तीसरा स्थान (3) पर होने से इंसान को ऐश्वर्य, नाम और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, ऐसे लोग हमेशा दूसरों की निःस्वार्थ भाव से मदद करते हैं। चौथा स्थान (4) पर होने से बहुत सी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है एवं माँ का स्वास्थ प्रभावित होता है। पाँचवा स्थान (5) संतान की प्राप्ति देर से होती है, जिससे स्मृति और बुद्धि दोनों ही कमज़ोर होती है और आगे की पीढ़ियों तक बुद्धि कमज़ोर रहती है। छटा स्थान (6) तांत्रिक तंत्र पर प्रभाव पड़ता है, काम करने वाले को जीत और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। साथवा स्थान (7) शादी होने मे विलंब या शादी में कोई रुचि ना होना, हमेशा उदास रहना, या बहुत अधिक आयु मे विवाह ही सकता है। आठवाँ स्थान (8) मन मे हमेशा अशांति, जीवन मे बहुत परेशानी, अत्यधिक संघर्ष, अनेक शत्रुओं से जीवन को हानि भी पहुंच सकती है। नौवा स्थान (9) पीता से अच्छे संबंध ना होना, एवं उनकी संपत्ति की प्राप्ति मे भी विलंब हो सकता है। दसवा स्थान (10) दूसरों के अधीन हो सकते हैं, अथवा नेतृत्व की प्राप्ति भी हो सकती है। ग्यारहह्वा स्थान (11). कर्मचारियों से मुनाफा कमाने का योग, कयी तरीकों से धन की प्राप्ति, अर्थात ऐसे मनुष्यों के लिए दूसरे लोग काम करके मुनाफा देंगे। बारहवां स्थान (12) अपने जन्म स्थान से दूर हो जाते हैं, कर्मचारियों को कर्ज मे डाल कर परेशानी ही पैदा करते हैं।